Tuesday, 2 Jun 2020

रमजान का आखिरी जुमा, जानिए आखिरी जुमा-तुल-विदा की अहमियत

लखनऊ- रमजान का आखिरी जुमा, इसे जुमा-तुल-विदा कहा जाता है, जो ईद के ठीक पहले वाले शुक्रवार को मनाया जाता है. ईद मुस्लिम समुदाय का बहुत बड़ा पर्व है, जो बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है..

आज सत्ताईसवां रोजा है. कल छब्बीसवां रोजा और शबे-क़द्र (सत्ताईसवीं रात) साथ-साथ थे. यहां यह बात जानना जरूरी है कि छब्बीसवां रोजा जिस दिन होगा, उसी शाम गुरुबे-आफ़ताब के बाद सत्ताईसवीं रात यानी शबे-कद्र भी शुरू हो गई है.

छब्बीसवें रोजे के साथ ताक रात यानी शबे-कद्र आएगी ही. सत्ताईसवां रोजा तो वैसे भी दोजख से निजात के अशरे में अपनी अहमियत रखता ही है. सत्ताईसवां रोजा दरअसल रोजादार को दोहरे सवाब का हकदार बना रहा है.

अब यह भी समझना जरूरी है कि आखिरी जुमा क्या अहमियत रखता है? जवाब यह है कि जिस तरह यहूदी मजहब में सनीचर को और ईसाई मजहब में इतवार को इबादत के लिए हफ़्ते का खास दिन माना जाता है. वैसे ही इस्लाम मजहब में जुमा इबादत और इज्तिमाई नमाज के लिए खास दिन माना जाता है.

हदीस-शरीफ में है कि जुमा के दिन ही हजरत आदम अलैहिस्सलाम को जन्नत से दुनिया में भेजा गया. उन्हें वापस जन्नत भी जुमा के दिन मिली. उनकी तौबा भी जुमा के दिन अल्लाह ने कुबूल की और सबसे बड़ी बात तो यह कि हजरत मोहम्मद सल्ल. की जिंदगी का आखिरी हज जुमे के दिन ही था.

कुरआने-पाक में सूरह ‘जुमा’ नाजिल की गई. आखिरी जुमा, माहे-रमजान की रुखसत का पैगाम है. कुल मिलाकर आखिरी जुमा यानी यौमे-खास रमजान की विदाई का अहसास. और रमजान के आखिरी जुम्मा को अलविदा की नमाज होती है जो इस्लाम धर्म में बहुत ही खास होता है.

Breaking News

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share via